क्या संवाद का कोई अर्थ है? या वाद करना व्यर्थ है? क्या कुछ बदलेगा उससे? परंतु ये समझना अवश्य है... ना बात होगी, ना तर्क होंगे, ना कुछ कहेंगे, ना कुछ सुनेंगे | सब अपने भ्रम में धुत होंगे, शायद सब अपने और अपनों के लिए सही भी होंगे || पर क्या सिर्फ अपना सच जानना पर्याप्त है? या किसी और के सच को समझना अप्राप्त है? सबका अपना सच, अपनी धारणाएं हैं, बस अपनी सोच में मदहोश, व्यक्तित्व की असमानतायें हैं | खुद अपनी आँखों में देखने के लिए कैसे समझाते हो खुद को? क्या ऐसा नहीं लगता वो भी जानना ज़रूरी है || मैंने सोचा बस मेरा सही होना मायने रखता है | कहा दूसरों का दृष्टिकोण कोई अहमियत रखता है || लेकिन सोचो तो धारणाएं इन दृष्टिकोणों का चक्रव्यूह ही तो हैं | और इन धारणाओं में बंध कर रहना मुझे स्वीकार भी नहीं है || शायद तर्क वितर्क से समझना चाहती हूँ, और उन दृष्टिकोणों का उद्गम ढूंढना चाहती हूँ | जागरूकता लाकर अपना दृष्टिकोण बताना चाहती हूँ, उस उद्गम स्थल को प्रेरित कर बदलाव का विश्वास खुद में जगाना चाहती हूँ || क्या कहीं कुछ बदलेगा उ...
Every experience brings out a new in you. Which new you want to be is your choice.