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अब तू मुझमें ही है!

 तेरी याद अक्सर आती है |  चाहूँ या ना चाहूँ, बस आ सी जाती है ||  कभी तेरा बिस्तर देखूं, तो कभी कुछ सामान |  नहाने का शैम्पू, खाने के बर्तन,  या हो सोने की तकिया, या तेरे खिलौनों की दूकान ||  जब कुछ बनाती हूँ कभी, जो अब बनाना बंद कर दिया है, जब कुछ खाती हूँ, जो तुझे पसंद है |  घर से जाना, बिना तुझे कहे कि "बस आयी", और फिर आना, ये जान कर तू वापस नहीं आयी ||  पहले यूँ हंसी निकल आती थी या तो कभी आँसू ... अब बस दिल तक रोक लेती हूँ तुझे, कि कोई ढूँढ ना ले मेरी आँखों में तुझे |  तेरी बातें सोचती हूँ, पर बोलती नहीं, क्या क्या कहूँ, मेरे लिए जो तू है, वो और किसी के लिए तो नहीं ||  हाँ, कुछ छोटे मोटे से सपने थे, कही अलट - पलट कर मिल जाते हैं |  बंद कर देती हूँ वो दरवाज़े,  शायद कुछ सपने यूँ अधूरे ही खो जाते हैं ||  अब सीख रही हूँ तेरी यादों को बस यूँ पेट से दिल तक रोकना |  तेरे पास ना होने के दुःख को बस ख़यालो में संजो रखना ||  क्योंकि जीना और दिल लगाना तो तूने ही सिखाया है,  लेकिन तुझसे ज़्यादा दिल किसी पर नहीं आया है |...

वाद - संवाद

क्या संवाद का कोई अर्थ है? या वाद करना व्यर्थ है? क्या कुछ बदलेगा उससे? परंतु ये समझना अवश्य है... ना बात होगी, ना तर्क होंगे, ना कुछ कहेंगे, ना कुछ सुनेंगे |  सब अपने भ्रम में धुत होंगे, शायद सब अपने और अपनों के लिए सही भी होंगे ||  पर क्या सिर्फ अपना सच जानना पर्याप्त है? या किसी और के सच को समझना अप्राप्त है? सबका अपना सच, अपनी धारणाएं हैं, बस अपनी सोच में मदहोश, व्यक्तित्व की असमानतायें हैं |  खुद अपनी आँखों में देखने के लिए कैसे समझाते हो खुद को? क्या ऐसा नहीं लगता वो भी जानना ज़रूरी है ||  मैंने सोचा बस मेरा सही होना मायने रखता है |  कहाँ दूसरों का दृष्टिकोण कोई अहमियत रखता है ||  लेकिन सोचो तो धारणाएं इन दृष्टिकोणों का चक्रव्यूह ही तो हैं |  और इन धारणाओं में बंध कर रहना मुझे स्वीकार भी नहीं है ||  शायद तर्क वितर्क से समझना चाहती हूँ, और उन दृष्टिकोणों का उद्गम ढूंढना चाहती हूँ |  जागरूकता लाकर अपना दृष्टिकोण बताना चाहती हूँ,  उस उद्गम स्थल को प्रेरित कर बदलाव का विश्वास खुद में जगाना चाहती हूँ   ||  क्या कहीं कुछ बदलेगा ...