अब तू मुझमें ही है!

 तेरी याद अक्सर आती है | 

चाहूँ या ना चाहूँ, बस आ सी जाती है || 


कभी तेरा बिस्तर देखूं, तो कभी कुछ सामान | 

नहाने का शैम्पू, खाने के बर्तन, 

या हो सोने की तकिया, या तेरे खिलौनों की दूकान || 


जब कुछ बनाती हूँ कभी, जो अब बनाना बंद कर दिया है,

जब कुछ खाती हूँ, जो तुझे पसंद है | 

घर से जाना, बिना तुझे कहे कि "बस आयी",

और फिर आना, ये जान कर तू वापस नहीं आयी || 


पहले यूँ हंसी निकल आती थी या तो कभी आँसू ...


अब बस दिल तक रोक लेती हूँ तुझे,

कि कोई ढूँढ ना ले मेरी आँखों में तुझे | 

तेरी बातें सोचती हूँ, पर बोलती नहीं,

क्या क्या कहूँ,

मेरे लिए जो तू है, वो और किसी के लिए तो नहीं || 


हाँ, कुछ छोटे मोटे से सपने थे,

कही अलट - पलट कर मिल जाते हैं | 

बंद कर देती हूँ वो दरवाज़े, 

शायद कुछ सपने यूँ अधूरे ही खो जाते हैं || 


अब सीख रही हूँ तेरी यादों को बस यूँ पेट से दिल तक रोकना | 

तेरे पास ना होने के दुःख को बस ख़यालो में संजो रखना || 


क्योंकि जीना और दिल लगाना तो तूने ही सिखाया है, 

लेकिन तुझसे ज़्यादा दिल किसी पर नहीं आया है | 


बस तेरी यादों को दिल से लगा कर हँस रही हूँ...


पहले घर में थीं तेरी यादें, अब तू मुझमें ही है | 

चाहूँ या ना चाहूँ, तेरी याद हर पल ज़हन में है ||

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