इंसानियत के सपने

अचानक आंख खुली|


बाहर देखा तो, अभी अंधेरा था ;

कुछ समझ नहीं पाई रात थी, या भोर का सवेरा था |

बड़ी जोरो से कुछ कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें थी ;

उफ़्फ़ ये शोर, क्या इन कुत्तों को दिन और रात की तहज़ीब नहीं थी?

 

कुछ दस मिनट चला ये तंटा, 

और फिर से वही समय का था सन्नाटा |

मैं फिर सो गई अपने बिस्तर में;

ढूंढते, अररर चादर कहां गई इस ठंड में ||


सुबह उठ पता चला, किसी ने एक कुत्ते पर गाड़ी चढ़ा दी |

वो रो रहा था और बाकियो ने भी गुहार लगा दी ||


अब रास्ता हो या फुटपाथ, ये भला कोई सोने की जगह है?

फ़िर गलती से कुचले जाने में गलती भी किसकी है?


इंसानों को एम्बुलेंस लेने के लिए कुछ मिनटों या घंटों में तो आ ही जाती है |

बाकी तड़प के मर जाते हैं, फिर एक दो दिन में नगर निगम की गाड़ी लाश उठा ले जाती है ||


हाँ अदालत में इंसानों के लिए मुक़द्दमा भी होता है |

पर बाकी का तो बस शोर ही होता है ||


एक साहब ने कहा मेरे रास्ते में कुत्ते नज़र ना आएं बस;

मैंने सोचा वर्क फ्रॉम होम का गहरा है असर सच |

काश! मैं भी ये कह पाती, मेरे रास्ते में ट्रैफिक ना आये; 

ना पाला पड़े ऐसे इंसानों से जो अंदर से हो गए हैं विरक्त ||


फिर एक महिला से सुना, वो क्यों खाना खिलाते हैं इन कुत्तों को यूं रास्ते पर |

घर ही ले जाते गर है इतनी फ़िक्र; ये दिखावा और शो शा तो ना कर ||


बात तो सही है, वरना अपने कहा अनाथालय और वृद्धाश्रम हैं |

अपने हो या पराए, बच्चे या बूढ़े सबको तो हम अपने घर में ही संभालते हैं ||


ऐसा सुना कि लोग पिल्लू या फिर अपना बूढ़ा कुत्ता छोड़ जाते हैं |

तो इंसान के बच्चे कूड़े में और बूढ़े रास्ते में छोड़े हुए भी तो मिल जाते हैं ||


अरे रे रे! ये क्या अब इंसान और जानवर की तुलना कर रही हो !

इंसान की तकलीफ़ और ज़रूरत है बड़ी ये कैसे भूल रही हो ?!?


चूंकि सही है एक हल्की सी चोट का दर्द और आघात इंसान को ज्यादा होता है |

पर रास्ते पर इंसान हो या जानवर, कुचले जाने पर भी कुछ नहीं बोल पाता है ||


कहीं एक जानवर होगा सोचता, इंसान के घर पर होता काश |

और कहीं एक बूढ़ा या अनाथ सोचता, एक घर अपनापन वाला मिलता ख़ास ||


ऐसे कई किस्से हैं इंसान के इंसानियत वाली दुनिया में, जहां जानवरों ने मचाया नाक में दम था |

पर ठंड में कंबल में सिमटे सोते हुए लगा, बस कुत्ते ना होते तो जीवन में सुकून था ||


आँखे मीचे और यही सब सोचते, मैं फिर सो गयी |

कहीं आंख ना खुल जाए इस भ्रम से, मैं अपने इंसानियत के सपनों में खो गई ||

Comments

  1. What a great poetic satire on the entire society! 🎭 #PoeticJustice #SocialCommentary

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