सोचती द्रुपद राजकुमारी - 1 - कन्या का दान

खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


एक राजकुमारी का स्वयंवर रचा था,

प्रतियोगिता का उद्देश्य और मान बड़ा था | 

होता भी क्यूँ ना, यज्ञसैनी का विवाह मंडप सजा था ||


अजन्मी, प्रकटी यज्ञाग्नि से, एक ओजस्वी अप्रतिम सुंदरी,

आयी कष्टों का भाग्य लेकर, देवों का संकल्प लेकर | 

भारत वर्ष का भाग्य बदलने, अपने लिए बस धर्म लेकर || 


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


अभी कुछ क्षण ही बीते थे, अपने सौभाग्य को सराहते,

चली थी बीहड़ वन अपने विजेता संग इठलाते | 

वो महल के सुख भोग से बड़ा आनंद था ,

पथरीले रास्तों  पर भी कंकड़ों का कोई दर्द ना था || 


माता से मिलने को तत्पर, हर्षित पांडव चल रहे आकुल | 

अर्जुन का था अद्भुत पराक्रम, रंगमंच में ना था ऐसा कोई धनुर्धर || 


"देखिये माता!

कैसा दान है  पाया, धनंजय ने सौभाग्य है लाया |"

ध्यान मग्न भूल गयीं कुंती, कि देखूं एक पल पलट कर | 

बस कह दिया,

"सब का अधिकार समान है, ले लो जो है  मिल बाँट कर" || 


अवाक् सब खड़े, सोचते समझते इसका क्या मतलब | 

द्रौपदी भागी बाहर, सोचती "कोई तो जगा दो इस दुःस्वपन से अब" || 


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 

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