सोचती द्रुपद राजकुमारी - 4 - विकल्प

खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


क्या करूँ कहाँ जाऊँ, किससे इस निरर्थक जीवन का अर्थ बूझूँ'?

इस व्यभिचारिता में क्या अर्थ है, उसमें कैसे पवित्रता ढुँढू ?

कर लिया जो मैंने पाँचो पांडवो से विवाह अगर,

सामर्थ्य का पतन ना होगा यूँ नियति से हार कर ?


ये कैसा संवाद है द्रौपदी, 

एक कन्या के नहीं हो सकते पाँच पति | 

ये कैसा विचार आया मेरे मन में,

अनाचार की इच्छा कैसे उत्पन्न हुई जीवन में ?


करूँ जो अपने सुख का विचार,

तो विवाह हो अर्जुन से और बस जाए मेरा संसार | 

कुरुराष्ट्र में फिर ना होगा शायद धर्म का प्रसार,

और होगा कुशाषन का अंधकार || 


परंतु उसमें दोष भी क्या है मेरा | 

भाग्य ने तो माता कुंती के साथ ये खेल है खेला || 


एक अयोग्य राजा बाँध देता है प्रगति को,

कुंठित कर देता है प्रजा की मति को | 

ऐसा राष्ट्र चला जाता है कई वर्ष पीछे,

जब तक कोई अगुआ आकर उसे आगे ना खींचे || 


कैसे अपने स्वार्थ के लिए,

एक राष्ट्र को महानता के अवसर से वंचित कर दूँ !

एक क्या, कई पीढ़ीयों को उनके भविष्य के लिए अतिशय चिंतित  दूँ !


नहीं नहीं! ये तो जीवन का ध्येय नहीं,

ऐसे जीवन में कोई श्रेय नहीं | 

माता का सुझाव लगता है सटीक,

भूल जाते हैं जो क्षण गया बीत || 


लेकिन क्या पुरुष के लिए संभव है अपनी इच्छाओं के ऊपर उठ पाना !

जिस पर सुन लिया अपना अधिकार, उसको इतनी सरलता से भूल जाना !!


आज तो अपनी सुंदरता पर भी है द्वेष | 

ना होता ये कौमार्य का सौंदर्य, और ना होता कोई क्लेष || 


चली जाती हूँ पिता के घर, कर देती हूँ निषिद्ध ये स्वयंवर | 


जानती हूँ आहत होगा मेरे पिता का हृदय,

लेकिन उससे अधिक कठिन है ये अपमान जनक दांपत्य | 

विफल करके द्रुपद का संकल्प, जीवन अब क्या सरल होगा,

वहाँ रहूँ या यहाँ, अब यातना का ही भाग्य होगा || 


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 

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