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सोचती द्रुपद राजकुमारी - 5 - संकल्प

खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


तभी माता कुंती को देख आते अपने ओर,

आवेश से भरा मन, द्रौपदी ने मुँह लिया फेर | 

"ऐसी विषम परिस्थितियों की आप हैं कारण,

लेकिन भोगना है उसके दुष्परिणाम मुझे ही अकारण ||"


"मुझे क्षमा करो पांचाली, दोषी मैं ही हूँ तुम्हारी,

लेकिन ध्यान से सुनो अब जो मैं कहती हूँ कुमारी | 

बहुत कटु वचन सुने हैं मैंने, इन पुत्रों को पाने में,

पालन पोषण करके बुने हैं, ये पांच मोती माले में || 


जब तक हैं ये जुड़े, तभी तक कौरवों से बलवान हैं,

जिस दिन एक मोती भी टूटा, मेरे पति पांडु का वह अपमान है | 

तुम हो एकाकी सुंदरी, विश्व में ना कोई ऐसी होगी,

जो तुम मिली अर्जुन को, मेरे माले में एक गाँठ पड़ जायेगी || 


कहाँ पुरुष इतना है समर्थ, उद्देश्य समर्पित हो पाए | 

शिथिल है उसका आत्मबल, गर स्त्री उसकी शक्ति ना बन पाए || "


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


"नहीं माता, क्या कहती हैं !  जीवन को क्यों दुःख से भरती हैं ?

नर्क से दुष्कर होगा प्रतिदिन, मृत्यु से भी दुःखदायी होगा हर क्षण || "


"जीवन यातना सरल है, जब उददेश्य स्वयं से बढ़ कर है | 

निर्णय का आशय न्यायोचित है, जब वह कर्म नियम पर आश्रित है ||


सहवास एक पति संग हो, इसमें ही पत्नी-व्रत बसता है | ,

पाँच वर्ष में एक वर्ष ही एक पांडव को पति-सुख मिलता है || "


"लेकिन माता, यह शंका है ! एक पुरुष के लिए ये क्या संभव है?


सब आकर्षित हैं  जब तक है यौवन ! 

जो सबकी है, उसका है कौन ?

अधिकार मेरा संरक्षित हो, 

इसका दायित्व भी लेगा कौन ?


इस नियम-बद्ध शादी में, क्या होगा प्यार और सम्मान ?

जहाँ मेरा हो मान, और मैं बनूँ पांडवों का अभिमान !!"


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 

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