सोचती द्रुपद राजकुमारी - 2 - धर्म का ज्ञान

खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


किंकर्तव्यविमूढ़ सुन रही वार्तालाप; माता विलाप करती,

"विवाह को दान कौन कहता है पुत्र !?!"

"कन्या का श्रेष्ठ दान ही तो है ये माता !

माता -पिता की भाग्य-लक्ष्मी को अपना सौभाग्य बनाने, माँगा ही तो जाता है ||"


"एक बार मुड़ कर देख तो लेतीं माता!"

धर्म राज की वाणी ने परिस्थिति को भाँपा |

'एक कन्या को पाँच भाईयों में बाँटा तो नहीं जा सकता !'

ये खुशी का क्षण, धर्मसंकट कैसे बन गया,

किसी को कुछ समझ नहीं आता || 


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 


"वाद विवाद आदेश अनादेश, इस पर चर्चा से कोई उपाय नहीं निकलता,

मैं अपना आदेश निषिद्ध करती हूँ, भूल जाते हैं जो कुछ पल पहले है घटा |

बस हम थे जिन्होंने सुना, समझा व परखा जो घटित हुआ,

मिटा देते हैं वे क्षण अपने मानस पटल से, जब मेरे मुख से वो आदेश अनायास ही निकल गया || "


"माता, आदेश देने से  पहले जैसे जानना औ बुझना होता है,

वैसे ही धर्म दूसरों को दिखाने के लिए नहीं, स्वयं निभाने से  होता है | 

वो धर्म क्या जो स्थिति - परिश्थिति में बदल जाए,

क्या अखंडता है उन संस्कारों की, जो जब कोई ना देखे तो फिसल जाएँ ||"


"क्या मूल्य है उस सत्य का जो अवसर के साथ बदल जाए | 

जब कोई देखे तो अपनायें, ना देखें तो भूल जायें ||"


खड़ी उस झुग्गी के बाहर, सोचती द्रुपद राजकुमारी | 

कुछ क्षण पहले तक, नियति लगती थी सखी हमारी || 

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